08 March, 2010

साजन के गुन गाये सखी री


साजन के गुन गाये सखी री, सावन की रुत आये रे,
मन ही मन मुसकाये सखी री
, साजन जब याद आये रे


बगियन मोर पपिहा बोले, उनकी याद दिलाये रे,
अखियन में सुध खोये सखी री
, साजन सामने आये रे


तन-मन का जब भेद मिटाकर, साजन सेज सजावे रे,
'
सूर-पिया' जब छेडे सखी री, राग बहार वो गाये रे


राग:- बहार
गीतकार
:- 'बेशुमार' (Bhavesh N. Pattni)
संगीतकार
:- सूर-पिया (Bhavesh N. Pattni)

तेरी दुनिया


तेरी दुनिया चश्म होता खुश-नुमा संगम है,
खूबसूरत
ख़ाब खोजे
, खुद-नुमा आलम है,
दश्त
--दुनिया दर--दर की देखता दिन रात वो,
दायरा
--वक़्त के ही दरमियाँ आदम है

ज़िन्दगी और मौत का, यूँ फासला तो कम है,
रोक लूँगा हर कज़ा को
, मुझ में गर ये दम है,
नब्ज़ का रुकना हमारी ज़िन्दगी का
'सम' है,
शब
-सबा तेरी है खालिक़, तू ही तू हर-दम है

खल्क़ से हों इब्न रुखसत, तो ग़म--मातम है,
ईद गर होती ये तेरी
, आँख क्यूँ कर नम है?,
हम
-नफ़स तुझसे खुदाया, तेरा ये हम-दम है,
तेरा तेरे पास आए
, वो तेरी मोहर्रम है

- '
बेशुमार'' (Bhavesh N. Pattni)

Written on 18-2-2010, 20 hours 30 min., Ahmedabad on Nirmal Pandey's death


चश्म = Sight, Eye

खुश-नुमा = Happy

खूबसूरत = Beautiful

ख़ाब = Dream

खुद-नुमा = Self-possessed

दश्त = Dust

दायरा- = Periphery

दायरा--वक़्त = Hands of time

आदम = First man born, man

कज़ा = Fate, jurisdiction, death

नब्ज़ = Vein

सम = End

ईद = Arabic – 'festivity'

शब = Night

सबा = Morning

खालिक़, = मालिक i.e. God

हर-दम = Every Time

मोहर्रम = The day of grief


कब तक


कब तक तुम्हारी बोज़िल सांसो का बोज़ लेकर फिरता रहूँगा मैं,
कब तक तुम्हारी सिसकती आँखोंमें आँसू बनकर उभरता रहूँगा मैं,
तुमसे जुदा होने के बाद अक्सर ये सोचता हूँ,
कब तक तुम्हारी यादों की आँधियों को मन ही मन में सिमटता रहूँगा मैं


- 'बेशुमार'

किरदार


हम तो अपना किरदार अदा कर चले जहाँमें,
इस भरे अंजुमनमें लोग क्यों रो रहे ?


- 'बेशुमार'

सैयाँ रंगीला



धिन्ना धिन धिन्ना, सैयाँ रंगीला
तिन्ना तिन तिन्ना
, मुखड़ा चमकीला
धिन्ना धिन धिन्ना
, सैयाँ नखरीला
तिन्ना तिन तिन्ना
, बादल चमकीला

सैयाँ की पगड़ी, धिन्ना धिन धिन्ना
पगड़ी मैं मोती
, तिन्ना तिन तिन्ना
मोती का मोल
, धिन्ना धिन धिन्ना
सोने की लगडी
, तिन्ना तिन तिन्ना

सैयाँ के नैना, धिन्ना धिन धिन्ना
मारे कटारी
, तिन्ना तिन तिन्ना
पलकों को मा
()री, धिन्ना धिन धिन्ना
देते वो चैईना
, तिन्ना तिन तिन्ना

सैयाँ का कुरता, धिन्ना धिन धिन्ना
कुर्ते का बोरिया
, तिन्ना तिन तिन्ना
साथ सुहावे
, धिन्ना धिन धिन्ना
ज़रकसी जामा
, तिन्ना तिन तिन्ना

सैयाँ के पैयाँ, धिन्ना धिन धिन्ना
पइयों में पाउँ
, तिन्ना तिन तिन्ना
जयपूरी जूती
, धिन्ना धिन धिन्ना
जूती नुकीली
, तिन्ना तिन तिन्ना

सैयाँ जब आवे, धिन्ना धिन धिन्ना
बादल गरजावे
, तिन्ना तिन तिन्ना
मनवा को मोरे
, धिन्ना धिन धिन्ना
पागल बनावे
, तिन्ना तिन तिन्ना

सैयाँ की बाहें, धिन्ना धिन धिन्ना
मुझको समावें
, तिन्ना तिन तिन्ना
दर्द हो मीठा
, धिन्ना धिन धिन्ना
भरती हूँ आहें
, तिन्ना तिन तिन्ना

रात को मोहे, धिन्ना धिन धिन्ना
नींद ना आवें
, तिन्ना तिन तिन्ना
प्रेम का पिया
, धिन्ना धिन धिन्ना
राग सूणावें
, तिन्ना तिन तिन्ना
धिन्ना धिन धिन्ना
, तिन्ना तिन तिन्ना

प्रेम का पिया, धिन्ना धिन धिन्ना
धिन्ना धिन धिन्ना
, तिन्ना तिन तिन्ना
राग सूणावें
, तिन्ना तिन तिन्ना
धिन्ना धिन धिन्ना
, तिन्ना तिन तिन्ना
धिन्ना धिन धिन्ना
, तिन्ना तिन तिन्ना


- Written and Composed by 'बेशुमार' on -०३-२०१०

28 September, 2009

मारो 'हेलो' उसके साथ


अरे जूठ मूठ का चक्कर चलता हर सुबहो हर शाम,
जिस के सर पे आये मुसीबत ले लो उसका नाम
,
नाम भी ऐसा बीच बज़ार में आवे भारी दाम
,
पर मन मंदीर जो दीया जलावें खाली उसके ठाम
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


कबीर, मीरा की बातों को सुनी है कानों कान,
फ़कीर
, पीर या साधू बन गया आया जिसको ग्यान
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


जड़-चेतन में हरी बसा है, घूसा है डारी पान,
सोला बरसे सान आवें
, बीसें आवें वान
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


मूरत हो या पत्थर लालची सब पे माथा टेक,
जुल्फें तेरी सर हों
'जालिम' तेरी सुणे ना एक
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


घोड़ा बेचा, घोडी बेचीं मियाँ चला परदेस,
सात जनम के भरम में घूम के लौटे अपने देस
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


मुरख तू क्यों चीख चीख कर गावे उसके गान,
अंतर से अँधा हो उसको कभी आवे भान
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


गांजा पी के चल गीरनारी, मेरी बातें मान,
चल चल चल तू चलता चल बस आगे सीना तान
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


उसकी माया अलख जगावे, लेख पे मारे मेख,
रख दरवाज़े दरीचे खुल्ले अदंर अपने देख
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


तेरे रंग में जो रंग जावे, साधू हो या शेख,
बीच बाज़ार में नाचे
- जमूरे देख तमाशा देख
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


ऊपर ढूँढा नीचे ढूँढा, हरी आवे हाथ,
सुमीरण कर तू सा
' कबीर कों, हर हैं तोरे साथ
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


जो कोई समज़ा मारो हेलो, लेता बस इक भेख,
एक अनेक है अनेक से फिर होता सबकुछ एक
मारो हेलो सांभळो हो जी रे
..........


- Written & Composed by 'बेशुमार'
Bhavesh N. Pattni
तारीख़ ११ अप्रैल २००९

27 September, 2009

रीत निराली


हरिहर तेरी रीत निराली,
अंबर धरती और हरियाली,
दिन में सूरज, रात को चंदा,
इस बगियन के है दो माली,
हरिहर तेरी रीत निराली


जंगल जंगल फूल बिछाये,
काँटों से फिर उन्हें बचाए
,
एक रुत आये
, एक रुत जाए,
अब मुरझाए
, तब खिल जाए,
सब रंगों का खेल रचाये
,
ऊपर मेघधनुष भी बनाये
,
एक भी कोना रहे न खाली
,
हरिहर तेरी रीत निराली


नर-नारी बीच प्रेम जगाये,
प्रेम के भी तू बीज उगाए
,
अंकुर फूटे तब समझाये
,
चक्कर तू ये कैसे चलाये
,
फसल पके दुनिया में आये
,
लालन पालन उसे कराये,
थप्पड़ कभी
, कभी दे ताली,
हरिहर तेरी रीत निराली


कल, आज और कल को बनाये,
तीनों काल पे तू ही छाये
,
भेद न इस का हमें बताये
,
कल की छाया आज पे आये
,
आज की माया कल पे ढाये
,
पाप पुन्य में करम गिनाये
,
चमड़ी गोरी हो या काली
,
हरिहर तेरी रीत निराली


- 'बेशुमार' Bhavesh N. Pattni
फरवरी २००९